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रेक्टिफायर परिपथ - 2


सेतु रेक्टिफायर में चार डायोड एक व्हीटस्टोन सेतु की भांति आपस में जुड़े होते है। यह पूर्ण तरंग रेक्टिफायर का ही एक रूप है।
किसी भी रेक्टिफायर परिपथ का निर्गत् पूर्ण रूप से डी.सी नहीं होता है बल्कि इसमें ए.सी. के कुछ अवयव विद्यमान होते हैं जिन्हें रिपल (Ripple) कहते है।
किसी भी रक्टिफायर परिपथ के निर्गत में प्राप्त पल्सेटिंग डी.सी. (Pulsating DC) में से रिपल के मान को अधिकतम संभव कम करना आवश्यक होता है। इसके लिए फिल्टर (Filter) परिपथ प्रयुक्त किए जाते हैं।
श्रेणी प्रेरक फिल्टर में एक उच्च मान (High Value) के प्रेरक (Inductor) L को रेक्टिफायर अवयव तथा लोड के साथ श्रेणी क्रम में जोड़ा जाता है।
शंट संधारित्र फिल्टर बहुतायत में उपयोग होने वाला एवं सबसे साधारण फिल्टर परिपथ है। इसमें एक उच्च मान का संधारित्र (Capacitorत) ब् रेक्टिफायर के निर्गत सिरों पर जोड़ दिया जाता है।
L फिल्टर या चोक निवेश फिल्टर L तथा C के संयोजन से प्राप्त फिल्टर होता है। इसे C सदैव Voltage  Stabilizing aciton प्रदान करता है तथा L Current Smoothing Action  प्रदान करता है। प्रेरक तथा संधारित्र के संयोजन से Ripples का मान घटाया जा सकता है।
पाई(3.14)-फिल्टर (पाई-फिल्टर) में एक शंट संधारित्र C (निवेशी सिरे पर), एक प्रेरक (L) तथा शंट संधारित्र (C2) आपस में जुड़े होते है। इसे पाई-फिल्टर (3.14-फिल्टर) कहते है क्योंकि L एवं C1 तथा C2 का संयोजक ग्रीक अक्षर पाई(3.14 के समान प्रतीत होता है। इस फिल्टर में रेक्टिफायर निर्गत प्रत्यक्ष रूप से C1 पर दिया जाता है। अतः इसे अर्द्ध तरंग रेक्टिफायर में भी प्रयुक्त किया जा सकता है। 

रेक्टिफायर परिपथ - 1


वह विद्युत परिपथ जिसके द्वार ए.सी. को डी.सी. में बदला जाता है, रेक्टिफायर परिपथ कहलाता है। यह एक डायोड परिपथ होता है, जो कि सॉलिड लिड स्टेट डायोडों, निर्वात् ट्यूब डायोडों तथा मर्करी आर्क वाल्व आदि से मिलकर बना होता है।
रेक्टिफायर परिपथ मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं -
(1) अर्द्ध तरंग रेक्टिफायर               (2) पूर्ण तरंग रेक्टिफायर
जब एक डायोड को उपयोग में लाकर रेक्टिफायर परिपथ बनाया जाए तो परिपथ को अर्द्ध तरंग रेक्टिफायर कहते है। यह डायोड निवेशी ए.सी. को निर्गत में पल्सेटिंग डी.सी. (Pulsating) में परिवर्तित करता है। यहां प्रयुक्त डायोड ए.सी. के धनात्मक चक्र (Positive) में चालन करता है तथा ऋणात्मक चक्र (Negative  cycle) में चालन नहीं करता है।
पूर्ण तरंग रेक्टिफायर में आरोपित निवेश (input) के दोनों चक्रो को प्रयोग में लाया जाता है तथा परिपथ में दो डायोड प्रयुक्त करके निर्गत (Output) में डी.सी. विभव (या धारा) प्राप्त किया जाता है।
पूर्ण तरंग रेक्टिफायर दो प्रकार से विभाजित किए जा सकते हैं-
(1) सेन्टर टेप पूर्ण तरंग रेक्टिफायर (Center-tap Wave Rectifer )
(2) सेतु रेक्टिफायर (Bridge Rectifier)
 सेन्टर टेप पूर्ण तरंग रेक्टिफायर में ट्रांसफॉर्मर के द्वारा ए.सी. निवेश आरोपित किया जाता है तथा दो डायोड D1 तथा D2 (इनकी अभिलाक्षणिकताएं समान होती हैं) सेन्टर टेप ट्रांसफॉर्मर की द्वितीयक कुण्डली के विपरीत सिरो पर लगे होते हैं तथा इनके कैथोड आपस में जुड़कर लोड प्रतिरोध (R1) से जुड़े होते हैं तथा यह पुनः आकर ट्रांसफॉर्मर के सेन्टर में जुड़ जाते है। 

बेसिक इलैक्ट्रॉनिक्स


ऐसे ठोस पदार्थ जिनको प्रतिरोधकता, चालकों तथा कुचालक के मध्य होती है, अर्द्धचालक कहलाते है। इस श्रेणी में जर्मेनियम, सिलिकॉन तथा सिलिनियम प्रमुख है।
अर्द्धचालक की चालकता को बढ़ाने के लिए पंच संयोजी तथा त्रिसंयोजी अशुद्धि का प्रयोग किया जाता है।
पदार्थ के संयोजी बैण्ड तथा चालक बैण्ड के मध्य अन्तराल को वर्जित ऊर्जा अन्तराल (Eg) कहते है।
अर्द्धचालक                                  वर्जित ऊर्जा अन्तराल
सिलिकाॅन ;(Si)                        1.12eV
जर्मेनियम ;(Ge)                         0.7 eV
इन्डियम एन्टीमनॉइड                  0.17 eV
गैलियम आर्सेनाइड                      0.33 eV

जब एक P प्रकार के अर्द्धचालक को N प्रकार के अर्द्धचालक से परमाणीय स्तर इस प्रकार जोड़ दिया जाये कि इनकी सम्पर्क सतह पर क्रिस्टल संरचना सतत् बनी रहें तो यह सम्पर्क P-N संधि तथा इस प्रकार बनी युक्ति P-N संधि डायोड कहलाता है।
P-N संधि डायोड के दो प्रकार से बायसित किया जा सकता है-
(1) अग्र बायस                 (2) पश्च बायस
P-N संधि बनाने के लिए तीन विधियां मुख्य हैं-
(1) मिश्रधातु संधि            (2) विसरण संधि              (3) वाष्प जमा या वर्धन संधि 

अर्थिंग - 2


ELCB युक्ति रिले की भांति धारा अथवा वोल्टेज चालित प्रकार की होती है और केवल 100mA। लीकेज धारा पर ही प्रचलित हो सकती है।
अर्थिंग तार को सुरक्षित रखने हेतु भूमितल से 30 से.मी.नीचे से तथा 12.5mm व्यास  के G.I. पाइप से ले जाना चाहिए।
पाइप के अर्थ इलेक्ट्रॉड पर पेन्ट किया हुआ नहीं होना चाहिए। 38mm  व्यास और 2.5 मी. लम्बाई का छिद्र युक्त पाइप होना चाहिए।
अर्थिंग हेतु प्लेट इलेक्ट्रॉड 60 से.मी. x 60से.मी. x  63मि.मी., G.I.  तथा ताम्बे की 60 x  60 x 3.18मि.मी. होनी चाहिए।
अन्तर्राष्ट्रीय मानक IEC 60364ने दो अक्षरों वाले कोड का प्रयोग करते हुए अर्थिंग व्यवस्था को तीन अवयवों TN,TT व IT में बांटा है।
TN अर्थिंग व्यवस्था में जनरेटर या ट्रांसफार्मर के एक पॉइंट  को अर्थ से कनेक्ट किया जाता है।
TT अर्थिंग सिस्टम में कन्ज्यूमर के प्रोटेक्टिव अर्थ कनेक्शन को लोकन कनेक्शन द्वारा अर्थ को उपलब्ध कराया जाता है। यह जनरेटर में किसी भी प्रकार के अर्थ कनेक्शन से स्वतंत्र होता है।
IT नेटवर्क में इलेक्ट्रिकल डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम का अर्थ से कोई कनेक्शन नहीं होता है बल्कि इसका केवल उच्च इम्पीडेन्स ;(Impendance) कनेक्शन होता है। 

अर्थिंग - 1

यह विधि जिसमें परिपथ के शॉर्ट होने पर उससे प्रवाहित लघु परिपथ (Short circuit) धारा को एक इलेक्ट्रॉड की सहायता से भूमि में सुगमतापूर्वक प्रवाहित किया जा सके, अर्थिंग कहलाती है।
भारतीय विद्युत नियम- 1956 के 32, 51, 61, 62, 67, 69, 89 व 90 उप-नियम इसके लिए प्रभावी है।
यदि हम डिस्ट्रीब्यूशन बोर्ड की मेटल बॉडी को अर्थ वायर की सहायता से अर्थिंग प्रदान करते है तो विद्युतीय शॉक से बचा जा सकता है।
एक धातु का पाइप, वाटर पाइप या अन्य कन्डक्टर जो भारतीय विद्युत नियमों के अनुरूप हो उसे पृथ्वी में दबा दिया जाता है, अर्थ इलेक्ट्रॉड कहलाता है।
अर्थिंग के लिए जब दो भागों को एक चालक द्वारा जोड़ा जाता है तथा फ़ॉल्ट  होने पर इससे फ़ॉल्ट धारा प्रवाहित होती है, इसे अर्थ चालक कहते है।
वह तार जिससे अर्थ इलेक्ट्रॉड को कनेक्ट किया जाता है, अर्थिंग लीड कहलाता है।
वह तार जो विद्युत चार्ज से पूर्ण हो, और अर्थ के साथ विभवान्तर रखे, लाइव तार कहलाता है।
प्लेट की सहायता से की गई अर्थिंग प्लेट अर्थिंग कहलाती है। यह अर्थिंग सरल व विश्वसनीय होती है। इस विधि में भूमि में लगभग 2-2.5 मीटर अथवा वहां तक जहां नमी निकल आए गड्ढ़ा बनाया जाता है।

पॉली-फेज विद्युत प्रणाली

दो या दो से अधिक फेजों की प्रणाली को बहु फेज या पॉली  फेज प्रणाली कहते हैं। जिसमें प्रत्येक फेज की वोल्टेज और आवृत्ति समान होती है परन्तु इनमें निश्चित फेज डिफ्रेन्स होता है।
टू फेजों के मध्य मापे गए पोटेंशियल डिफ्रैन्स को लाइन वोल्टेज कहते है तथा VL से दर्शाते हैं।
फेज व न्यूट्रल तार के मध्य विभवान्तर को फेज वोल्टेज कहते है। इसे Vph से दर्शाते हैं।
किसी फेज के श्रेणी क्रम में लगाए गए एम्पियर मीटर द्वारा लाइन करन्ट IL मापी जाती है।
थ्री फेजों के तीन अलग-अलग लगाए गए साधन की एम्पियर मीटर द्वारा मापी गयी धारा को फेज धारा Iph  कहते हैं।
एक थ्री फेज प्रणाली में उत्पन्न वि.वा. बल का अपने अधिकतम मान को प्राप्त करने का क्रम फेज क्रम कहलाता है।
एक्टिव कम्पोनेन्ट को इनफेज या वाट फुल कम्पोनेनट कहते है इसमें पावर खर्च होती है।
रिएक्टिव कम्पोनेन्ट को वाट लेस (watt less) कम्पोनेन्ट कहते है। इसमें शून्य पावर खर्च होती है।
वोल्टेज और धारा के रिएक्टिव कम्पोनेन्ट(I sinф) के मध्य कोण 90डिग्री  होता  है इस कारण कम्पोनेन्ट में शून्य पावर व्यय होता है।
सम हार्मोनिक्स उस हार्मोनिक्स को कहते हैं जिनकी आवृत्ति मूल आवृत्ति की सम गुणांक हो अर्थात् 2 गुना, 4 गुना, 6 गुना आदि।
विषम हार्मोनिक्स उन हार्मोनिक्स को कहते है जिनकी आवृत्ति मूल आवृत्ति की विषम हो अर्थात् 3 गुना, 5 गुना, 7 गुना आदि।
धारितीय परिपथ की प्रतिघात, प्रयुक्त वोल्टेज की आवृत्ति के व्युत्क्रमानुपाती होती है अर्थात् आवृत्ति बढ़ने पर प्रतिघात घट जाता है। 

प्रत्यावर्ती धारा


वह वोल्टेज जिसकी धु्रवता का मान समय के सापेक्ष परिवर्तित होता है उसे प्रत्यावर्ती वोल्टेज कहते हैं।
वह धारा जिसका मान व दिशा निश्चित समयान्तराल में परिवर्तित होता रहता है उसे प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं।
प्रत्यावर्ती धारा की दिशा और मान के एक पूर्ण परिवर्तन को चक्र ....... कहा जाता है तथा एक चक्र को पूर्ण करने में लगा समय आवर्त काल कहलाता है।
प्रत्यावर्ती धार के वर्ग माध्यम मूल मान तथा औसत मान के अनुपात को फॉर्म  फैक्टर कहते हैं।
ऊर्जा को विद्युत आवेश के रूप में भण्डारित करने की योग्यता को धारिता कहते हे। इसका मात्रक फैरेड होता है।
श्रेणी क्रम में संयोजित संधारित C1ए C2 व C3 की धारिता .............................होगी
समान्तर क्रम में संयोजित संधारित्र C1ए C2 व C3 की कुल धारिता (C1+C2+C3) होगी।
वास्तविक शक्ति तथा आभासी शक्ति के अनुपात को शक्ति गुणक कहते हैं।
शक्ति गुणक के सुधार की निम्न विधियां है-
(1) स्टैटिक संधारित्र के प्रयोग द्वारा
(2) तुल्यकाली संधारित्रों के प्रयोग द्वारा
(3) फेज एडवान्सर के प्रयोग द्वारा
KW वाटमीटर द्वारा मापी गयी वास्तविक शक्ति है।
KVA मशीन की रेटेड पावर है। इसे आभासी पावर भी कहते है।
KV एक्टिव कम्पोनेन्ट = KVA*cosф

चुम्बकत्व - 4

नियम और उपयोग (Law and Use) -
क्र.स.     नियम/सिद्धान्त(Law/Princpal) उपयोग (Uses)         
एम्पियर का नियम           ओवर हैड लाईन में धारा की दिशा ज्ञात करने में।
कॉर्क  स्क्रू नियम               चालक के आस-पास चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने में।
दाएं हाथ के अंगूठे का नियम           चालक के आस-पास चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने में।
एण्ड नियम                     विद्युत चुम्बक के धु्रव ज्ञात करने हेतु।
फ्लेमिंग के दाएं हाथ का नियम       जनरेटर में उत्पन्न e.m.f. दिशा ज्ञात करने हेतु।
लेन्ज का नियम               चुम्बकीय क्षेत्र में घूमती डिस्क आदि में भंवर धारा (एडी करेन्ट) आदि की दिशा ज्ञात करने के लिए।

चुम्बकत्व - 3

पदार्थो को चुम्बकीय आधार पर तीन भागों में बांटा गया है-
(1) लौह चुम्बकीय पदार्थ (ferro Magnetic Material)
(2) अनु चुम्बकीय पदार्थ ( Pera Magnetic Material)
(3) अचुम्बकीय पदार्थ (Dia Magnetic Material)
यदि किसी इन्सुलेटेड सुपर इनेमल तार से बने क्वॉयल को फिर क्वॉयल की तरह मोड़ा जाए तो उसे टोरॉइड कहते है।
इन्सुलेटिड तार को गोल आकार में बहु से टर्न दे दिए जाएं तो ये सोलेनाॅयड कहलाता हैं। यह भी क्वॉयल का रूप होता है। इसकी लम्बाई इसके व्यास से अधिक होती है।
दाएं हाथ के नियम से चालक में उत्पन्न e.m.f. की दिशा ज्ञात की जाती है। यदि दाएं हाथ का अंगूठा, तर्जनी अंगुली, मध्य अंगुली या तीनों एक-दुसरे से 900 पर हो व अंगूठा चालक के घूमने की दिशा में, तर्जनी अंगुली चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में हो तो दाहिने हाथ के मध्य की अंगुली उत्पन्न इलेक्ट्रोमोटिव फोर्स (e.m.f.)  या विद्युत वाहक बल की दिशा दर्शाएगी। 

चुम्बकत्व - 2

पदार्थ में चुम्बकीय गुण बनाने की या चुम्बकित करने की मुख्य विधियां निम्न प्रकार से हैं -
(1) स्पर्श विधि                 (2) विद्युत धारा विधि                   (3) प्रेरण विधि
चुम्बकीय क्षेत्र में विद्यमान चुम्बकीय बल रेखाओं के निम्न महत्वपूर्ण गुण होते हैं-
1. सभी चुम्बकीय बल रेखाएं अपना परिपथ पूर्ण करती है।
2. चुम्बकीय बल रेखाएं चुम्बक के अन्दर दक्षिण से ध्रुव उत्तर ध्रुव की ओर व बाहर उत्तर से दक्षिण की ओर चलती है।
स्थायी एवं विद्युत चुम्बक में तुलना
क्र.स.     स्थायी चुम्बक      विद्युत चुम्बक
1.इसकी चुम्बकता का मान स्थिर रहता है।             इसकी चुम्बकता घटाई व बढ़ाई जा सकती है।
2.इसकी प्रबलता स्थिर है।                                     इसकी प्रबलता, धारा पर निर्भर रहती है।
3.इसका उपयोग दिशा सूचक में होता है।                 इसका उपयोग दिशा सूचक में नहीं होत है।
4.इसके द्वारा अधिक भार नहीं उठाया जा सकता है।   इसके द्वारा अधिक भार उठाया जा सकता है।
5.ये छोटी मोटरों में काम आते हैं।                           ये जनरेटर, मोटर, ट्रांसफाॅर्मर सभी बड़ी मशीनों में काम आते हैं।
6.इनके धु्रव नहीं बदले जा सकते।                         इनके धु्रव बदले जा सकते है।
7.इनका मूल्य कम होता है।                                  इनका मूल्य अधिक होता है।  

चुम्बकत्व - 1


चुम्बक के चारों वह क्षेत्र जिससे पदार्थ बल का अनुभव करता है उसे चुम्बकीय क्षेत्र कहते हैं तथा चुम्बक के इस गुण को चुम्बकत्व कहा जात है।
चुम्बक मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है-
(1) प्राकृतिक चुम्बक                     (2) कृत्रिम चुम्बक
विभिन्न प्रकार के कृत्रिम चुम्बक निम्न प्रकार है-
(1) छड़ चुम्बक (Bar Magebt) - यह आयताकार होता है इसके किनारों पर सर्वाधिक चुम्बकीय गुण होते हैं।
(2) घोड़ा नाल चुम्बक (Cylindrical Magent) - इसे आयताकार लोहे की छड़ को मोड़कर घोड़े के नाल की आकृति दी जाती है और इसके किनारों पर चुम्बकत्व रहता है।
(3) बेलनाकार चुम्बक (Cylindrical Magent) - इसे बेलनाकार छड़ द्वारा बनाया जाता है।
(4) अंगूठी चुम्बक (Ring Magent) - इसमें लोहे के द्वारा अंगूठी बनाई जाती है फिर उसमें चुम्बकीय गुण उत्पन्न किए जाते हैं। 

सामान्य शीट मैटल टूल्स - 3

 शीट के टुकड़ो को आपस में जोड़ने के लिए विभिन्न प्रकार के जॉइंट लगाये जाते हैं जिन्हें सीम (Seam) कहते है।
लकड़ी के दो अलग-अलग टुकड़े जस स्थान पर एक-दुसरे से मिलते हैं, जोड़ कहलाता है। अधिकांश जोड़ो को किसी-न-किसी बाहरी बल की सहायता से रोका जाता है, जैसे-गोंद, स्टेपल तथा स्क्रू।
जोड़ आठ प्रकार के होते हैं-
(1) बट जॉइंट  (Butt Joint)
(2) मीटर्ड बट जॉइंट  (Mitered Butt Joint)
(3) हॉफ  लैप जॉइंट  (Half Lap Joint)
(4) टंग और ग्रूव जाइंट (Tongue and Groove Joint)
(5) मोर्टाइज और टेनन जॉइंट  (Mortise and Tenon Joint)
(6) डोवटेल जॉइंट (Dovetail Joint)
(7) कुर्सी जॉइंट  (Dado Joint)
(8) रैबेट जॉइंट  ( Rabbet Joint)

सामान्य शीट मैटल टूल्स - 2

शीट मैटल को काटने में प्रयुक्त औजार निम्न है -
1. स्निप              2. शीयर                         3. शीयरिंग मशीन
धातु चादर शॉप में विभिन्न चोट लगाने वाले औजारों (Measurement) का बड़ा महत्व है जिससे विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं को पूरा किया जा सकता है जैसे - रिवेटिंग (riverting), क्रिजिंग (creasing), स्ट्रेचिंग (stretching) आदि।
मुलायम हथौड़े को मुंगरी (mallet) कहते है। इसे सॉफ्ट  हथौड़े को नाम से भी जाना जाता है। इसका उपयेग पतली धातु चादर को मोड़ने या सीधी करने के लिए किया जाता है।
लकड़ी के छेद करने के काम में आने वाले औजार छेद (सुराख) करने वाले औजार कहलाते है। ये निम्नलिखित है -
(1) ब्राडाल या सुआ          (2) गिमलेट         (3) ऑगर बिट     (4) हैण्ड ड्रिल मशीन
यह धातु की एक गोल छड़ होती है, जिसके एक सिरे पर हैड और दूसरे सिरे पर टेल बनी होती है इसको रिवेट कहते है। दो या दो से अधिक शीटों को अर्द्ध स्थाई (Semi-Permanent) रूप में जोड़ने के लिए इसका प्रयोग करते हैं।
 रिवेट के निम्नलिखित भाग होते हैं -
(1) हेड (Head)               (2) बाॅडी (body)           (3) टेल (Tail)
रिवेट के द्वारा धातु की चद्दरों को जोड़ने को रिवेटिंग जोड़ कहते है। रिवेटिंग जोड़ दो प्रकार के होते हैं-
(1) लैप जोड़ (Lap-Joint) (2) बट जोड़ (Butt Joint)

सामान्य शीट मैटल टूल्स - 1

शीट मैटल टूल्स के द्वारा धातु चादर को काटा, मोड़ा व जोड़ा जाता है।
धातु चादर शॉप में किसी भी वस्तु या जॉब  का निर्माण करने के लिए या निर्माण करते समय ड्राईंग के अनुसार उसका माप (Measurement) लेना तथा उसे चैक करना जरूरी होता है। इसके लिए जिन औजारों का प्रयोग किया जाता है उसे मापक औजार (measuring) कहते है।
कोई भी कार्य या जॉब  प्रारम्भ करने से पहले ड्राईंग के अनुसार जॉब  की मार्किंग करना बहुत जरूरी होता है। बिना मार्किंग के जॉब  सही माप के अनुसार नहीं बनता है।
मुख्यतया जो मार्किंग औजार काम में लिए जाते है वो निम्नलिखित हैं -
1. स्क्राइबर (Scriber)
2. विभाजक (Divider)
3. ट्रेमल (Trammel)
4. मार्किंग पंच (Marking Punch)
5. अर्ध गोलाकार चांदा (Semi-circular Protector)          
6. स्टील रक्वायर (Steel Square)

सामान्य फिटिंग टूल्स - 3

कैलीपर एक साधारण मापन (Measuring) यंत्र है, जिसका उपयोग स्टील टूल्स से जॉब  तक और इसके विपरीत मापन कर अन्तरण करने के लिए किया जाता है। कैलीपर के लैग के आकार एवं जोड़ की किस्म के अनुसार ये विभिन्न प्रकार के होते हैं-
जोड़ के अनुसार कैलीपर दो प्रकार के होते है -
(1) दृढ़ जोड़ वाले कैलीपर (Firm Joint Caliper)
(2) स्प्रिंग जोड़ वले कैलीपर (Spring Joint Caliper)
लैग के अनुसार कैलीपर निम्न प्रकार के होते है -
(1) ब्राह्य कैलीपर (Outside Caliper)
(2) आन्तरिक कैलीपर (Inside Caliper)
(3) जैनी कैलीपर (Jenny Caliper)
जब किसी जॉब  पर परिशुद्ध (Accurate) विमितिय विशेषतओं को अंकित करना होता है तब यह परम आवश्यक है कि डाटम प्लेन पूर्णतः समतल सतह हो।
असमतल सतह को डाटम मानने से विमाएं (Dimensions ) अपरिशुद्ध हो सकती है।
मशीन शॉप के कार्यो के लिए सबसे अधिक उपयोग में आने वाली डाटम सतह सरफेस प्लेट एवं नम्बर प्लेट है। सरफेस प्लेट सामान्यतः अच्छे गुणों वाले ढलवां लोहे से बनायी जाती है, जिसमें विरूपण (Distorsion) से बचाव के लिए प्रतिबलों को दूर कर दिया जाता है।

सामान्य फिटिंग टूल्स - 2

टूल के प्रकार
क्र.स.     टूल का नाम        नाम     
1.            कटिंग टूल           हस्त सॉ, टेनन सॉ,                पैड- सॉ ,या की-होल सॉ  
2.            कटिंग टूल           हस्त रेती            , वर्ग रेती,त्रिकोनी रेती   
3.            कटिंग टूल           चैरसी छैनी,साल छैनी, सॉकेट छैनी           
4.            कटिंग टूल           हैक्सों  
5.            मार्किंग टूल         परती पैमाना,सीधी पट्टी पैमाना   
6.            मार्किंग टूल         ट्राई रक्वायर      
7.            मार्किंग टूल         डिवाइडर         
8.            मार्किंग टूल         खरोचनी          
9.            चैट मारने वाला टूल         हैमर    
10.          पकड़ने वला टूल              वाइस
वर्कशॉप  में प्रतिदिन सुराख करने क आवश्यकता रहती है, अतः इन सुराखों को करने के लिए जिस टूल का प्रयोग किया जाता है उसे ड्रिल (Drill) अथवा बरमा कहते है।
ड्रिल द्वारा धातु में सुराख करने के लिए जिस मशीन का प्रयोग किया जाता है, उसे ड्रिलिंग मशीन (Drilling Machine) कहते है।
किसी गोल सुराख टैप द्वारा चूड़ी काटने की क्रिया को टैपिंग (Tappings) कहते है। टैपिंग में प्रयुक्त उपकरण को टेप कहते है। 

सामान्य फिटिंग टूल्स - 1



वे मशीन टूल्स जो किसी मशीन की संरचना एवं आवश्यकता होने पर इनकी मरम्मत के लिए आवश्यक होते है फिटिंग टूल्स कहलाते है। जैसे - रेती, प्लायर, हैमर, डाई व रेंच आदि।
 उपयोग के आधार पर इन्हें निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है -
1. कटिंग टूल्स (Cutting tools)
2. मार्किंग टूल्स (Marking tools)
3. चोट मारने वाले टूल्स (Striking tools)
4. पकड़ने वाले टूल्स (Holding tools)
5. ड्रिलिंग टूल्स (Drilling tools) 
6. प्लेनिंग टूल्स (Planning tools)
 वे टूल्स जो किसी कार्यखण्ड (workpice) से अतिरिक्त भाग को हटाने के लिए काम में लिए जाते हैं कटिंग टूल्स कहलाते है। 

वोल्टेज स्टेबलाइजर - 3

शॉर्ट ब्रेक UPS में 4 से 5 समयान्तराल के बाद लोड को सप्लाई मिलती है। इस तंत्र में मुख्य ए.सी. सप्लाई, डी.सी. में बदली जाती है।
1. ऑफ  लाइन यूपीएस (Off  Line UPS) - स्थैतिक तथा घूर्णी प्रकार की तरह ही इसे ऑफ लाइन या ऑन लाइन यूपीएस में बांटा जाता है।
2. ऑन लाइन यूपीएस (On Line UPS) – ऑन लाइन यूपीएस, ऑफ  लाइन यूपीएस की तुलना में महंगे होते है। इस डिजाइन में बैट्री इन्वर्टर द्वारा चार्ज होती है।
ऑटोकट वोल्टेज स्टेबलाइजर प्रकार की पावर सप्लाई प्रायः 160 वोल्ट से 250 वोल्ट परिवर्ती ए.सी. से 230 वोल्ट स्थिर ए.सी. तैयार करने के लिए प्रयोग की जाती है। इसमें मुख्यतः लो-वोल्टेज मेन्स ट्रांसफार्मर, जीन नियंत्रित रिले परिपथ आदि होते हैं।
बैट्री चार्जर एक विद्युत युक्ति है जिसका उपयोग बैट्री में ऊर्जा देने के लिए किया जाता है। बैट्री चार्जर पावर लाइन से प्राप्त ए.सी. को चार्जर के लिए उपयुक्त डी.सी. में परिवर्तित कर देता है।
बैट्री चार्जर में एक Circuitry भी होती है जो बैट्री के वोल्टेज को मोनीटर करती है और स्वतः ही चार्जिंग धारा को समंजित कर देती है। जब बैट्री पूर्णतया चार्ज हो जाती है। 

वोल्टेज स्टेबलाइजर - 2

परिपथ बनावट के आधार पर SMPS को निम्न दो प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है-
(1) नॉन -आइसोलेटेड (Non-isolated) (2) आइसोलेटेड ;(Isolated)
6v/12v बैट्री इनपुट 230 वोल्ट ए.सी. आउटपुट को तैयार करने वाली पावर सप्लाई, अंतवर्तक (Inverter) कहलाती है। इनमें निम्न आवृत्ति ऑसिलेटर, एम्पलीफायर आदि होते हैं।
यू.पी.एस. एक ऐसी युक्ति होती है जो विद्युत से चलने वाले किसी उपकरण को उस स्थिति में भी सीमित समय के लिए विद्युत की समुचित आपूर्ति सुनिश्चित करती है जब आपूर्ति के मुख्य स्त्रोत से विद्युत आपूर्ति उपलब्ध नहीं होती।
वे अंतवर्तक, जिनमें कम्यूटेटिंग अवयव स्थायी रूप से भार के साथ्ज्ञ श्रेणी क्रम में जुड़े हो, श्रेणी अंतवर्तक कहलाते है। श्रेणी परिपथ के व्यवहार के कारण धारा का मान शून्य हो जाता है।
अंतवर्तक परिपथ विभिन्न शक्ति स्त्रोत जैसे - बैट्री, सौर पैनल इत्यादि से दिष्ट धारा लेकर उसे प्रत्यावर्ती धारा में बदलता है अर्थात् यह उन सभी उपकरणों के लिए महत्वपूर्ण है जो प्रत्यावर्ती धारा हेतु डिजाइन है तथा जो वांछित विभव के लिए दिष्टकारी द्वारा दिष्ट धारा बनाते हैं।

वोल्टेज स्टेबलाइजर - 1


वैद्युतिक एवं इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों/उपकरणो को स्थिर मान के वोल्टेज से प्रचलित करना आवश्यक होता है। जिसके लिए एक ऐसे उपकरण की आवश्यकता होती है जो मेन्स वोल्टेज में होने वाले परिवर्तनों को सहतें हुए स्थिर वोल्टेज मान का आउटपुट प्रदान कर सके; ऐसा उपकरण, स्टेबलाइज्ड पावर सप्लायर या वोल्टेज स्टेबलाइजर कहलाता है।
वोल्टेज स्टेबलाइजर दो प्रकार के होते है -
(1) हस्तचालित वोल्टेज स्टेबलाइजर  
(2) स्वचालित वोल्टेज स्टेबलाइजर
इन्वर्टर (Inverter) एवं यू.पी.एस. (UPS), स्वचालित वोल्टेज स्टेबलाइजर है।
स्विच मोड पावर सप्लाई भी आई.सी. आधारित पावर सप्लाई है जो प्रायः 6v डी.सी. इनपुट से 12v से 48v के बीच डी.सी. आउटपुट प्रदान कर सकती है। इसका उपयोग इलेक्ट्रोनिक उपकरणों (12v.48V) को 6v स्त्रोत से प्रचलित करने के लिए किया जाता है।