Showing posts with label सेमेस्टर 3. Show all posts
Showing posts with label सेमेस्टर 3. Show all posts

घरेलू एवं कृषि उपकरण - 3

  • जेट पम्प को 35 मिमी. कपलिंग, 25मिम. यूनियन, 25मिमी. इजेक्शन पाइप, 38मिमी, सेक्शन पाइप, स्टेनर फुट वाल्व पाइपों की लम्बाई आवश्यकतानुसार, HP से 1/12) HP तक मोनों ब्लॉक मोटर प्रेशर गेज आदि काम आते हैं। यह मोटर लगाकर पानी बाहर निकालने का एक सिस्टम है।
  • जमीन के अन्दर गहराई में जो पम्प लगाए जाते है, वे सबमर्सिबल पम्प कहलाते है। सबमर्सिबल पम्प अपकेन्द्रीय पम्पों की श्रेणी में आता है। इस प्रकार के पम्पों में तीन फेज की मोटर काम में ली जाती है।
  • जनरेटर को कृषि मशीनों के चालान के लिए उपयोग लिया जाता है। कृषि में उपयोगी पावर-हत्था, थ्रेशिंग मशीन, बाइन्डर आदि में जनरेटर का उपयोग किया जाता है।
  • कृषि उपकरण प्लाऊ द्वारा मिट्टी को खोदा जाता है।
  • ड्रैग, कृषि उपयुक्त जमीन को कई टुकड़ो में बांट देता है।
  • स्प्रेयर द्वारा कीटनाशक दवाइयों को खेत में छिड़का जाता है।
  • टिलेज द्वारा बीजों को खेत में समान रूप से डाला जाता है।
  • फर्टिलाइजर द्वारा खाद को खेत में समान रूप से डाला जाता है। 

घरेलू एवं कृषि उपकरण - 2

  • इमरशियन हीटर में नाइक्रोम धातु का बना एलीमेन्ट लगा होता है।
  • रूम हीटर में सिरेमिक पदार्थ की बनी गोल रॉड पर एलीमेन्ट, जो कि नाइक्रोम धातु का बना होता है, लपेटा जाता है।
  • साधारण इलैक्ट्रिक आयरन में क्रोमियम से पॉलिश की बेस प्लेट, नाइक्रोम तार का एक एलीमेन्ट, एक कास्ट आयरन प्रेशर प्लेट आदि भाग होते हैं।
  • ऑटोमेटिक इलैक्ट्रिक आयरन में ताप को नियंत्रित करने के लिए थरमोस्टेट प्रयोग किया जाता है।
  • कुकिंग रेन्ज का उपयोग घरों और होटलों में भोजन को पकाने के लिए किया जाता है।
  • विद्युत केतली का प्रयोग दूध गर्म करने, पानी गर्म करने आदि में किया जाता है।
  • हेयर ड्रायर का प्रयोग बालों को सुखाने के लिए किया जाता है।
  • विद्युत ग्राइन्डर का प्रयोग घर में अनाज को पीसने के लिए किया जाता है। 

घरेलू एवं कृषि उपकरण - 1


  • वर्तमान में विद्युत से चलने वाले उपकरणों का उपयोग अनेक क्षेत्रों जैसे - घरेलू, कृषि उद्योग, चिकित्सा आदि में किया जा रहा हैं ये विद्युत उपकरण प्रदूषण रहित होते है। घरेलू विद्युत उपकरण तापीय तथा चुम्बकीय आधार पर कार्य करने वाले होते है तथा कृषि विद्युत उपकरण मोटर के सिद्धान्त व सोलर उपकरण, सौर ऊर्जा के सिद्धान्त पर कार्य करते हैं। अधिकतर प्रयोग में आने वाले घरेलू उपकरणों मे छत के पंखे, हीटर, विद्युत इस्त्री, गीजर, वाटर कूलर, डेजर्ट कूलर, फ्रिज, विद्युत घन्टी, मिक्सी, ग्राइन्उर, टोस्टर, इमरशियन हीटर, टेबल फैन आदि आते हैं। कृषि उपकरणों में वाटर-पम्प, पावर हत्था (Power Tiller), थ्रैशिंग मशीन (Threshing Machinery), कटाई के लिए फार्म ट्रेक्टर  के उपकरण, बाइन्डर आदि उपकरण प्रयोग किए जाते हैं। 
  • इलैक्ट्रिक हीटर में जब विद्युत प्रतिरोध में से गुजरती है तो ऊष्मा उत्पन्न होती है। इस ऊष्मा से उत्पन्न करने के प्रभाव को ऊष्मीय उपसाधनों जैसे विद्युत इस्त्री, हॉट - प्लेट, विद्युत केतली, टोस्टर, इमरशियन रॉड आदि में उपयोग में लाया जाता है। 

औद्योगिक एवं घरेलू वायरिंग - 2

  • वायरिंग ले-आउट के लिए निम्न पदों का अनुसरण किया जाता है -
  1. सबसे पहले भवन का सिविल इंजिनियर द्वारा बना ले-आउट लेते है।
  2. ले-आउट में विद्युत लाइन के प्रवेश एवं निर्गत स्थानों को चिन्हित करते हैं।
  3. ले-आउट में भवन मालिक की आवश्यकता के अनुसार विद्युत बल्ब, ट्यूबलाइट, पंखा, दीवार साॅकेट आदि के बिन्दु चिन्हित करते हैं।
  • स्प्लिट लोड वायर किसी भी उपभोक्ता इकाई में उपयोग होने वाला सबसे सुरक्षित प्रकार का वायर है जो कि ओवरलोडिंग, शोर्ट-सर्किट, अर्थ-लीकेज आदि समस्याओं से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • विभिन्न प्रकार के घरेलू उपकरणों के दोष ज्ञात करना तथा उनके दोष-निवारण का ज्ञान एक इलेक्ट्रिशियन के लिए अति आवश्यक है। अतः किसी भी उपकरण को सुचारू रूप से चलाने के लिए उसका निरीक्षण व रख-रखाव समय-समय पर करना चाहिए।
  • सजावटी लाइटों के लिए ड्रम फ्लैशर, सीक्वेन्शियल कन्ट्रोलर, निऑन  फ्लैशर आदि उपयोग में लिए जाते हैं।
  • बंद हुए सजावटी बल्बों की श्रेणी में से फ्यूज बल्ब का पता लगाने के लिए निम्न दो विधियां प्रयोग की जाती है -
  1. JFET विधि
  2. निऑन बल्ब विधि 

औद्योगिक एवं घरेलू वायरिंग - 1


  • औद्योगिक वायरिंग, घरेलू तथा व्यावसायिक वायरिंग के ही समान होती है। औद्योगिक तथा घरेलू दोनों प्रकार की वायरिंग में त्रिकलीय-चार तार प्रणाली उपयोग में ली जाती है। औद्योगिक वायरिंग में स्विच-फ्यूज के स्थान पर सर्किट ब्रेकर का उपयोग किया जाता है।
  • मानक कोड SI 732: 1989 को इलेक्ट्रिक वायरिंग इन्सटॉलेशन  के लिए उपयोग किया जाता है।
  • मानक कोड SI 6665 रू 1972 को औद्योगिक लाइटिंग के लिए उपयोग किया जाता है।
  • मानक कोड SI 3043 रू 1987 को अर्थिंग के लिए उपयोग किया जाता है।
  • औद्योगिक कन्ट्रोल पेनल को उद्योगों में उपयोग किया जाता है। जिनका ऑपरेटिंग  वोल्टेज 600 वोल्ट या इससे कम होता है।
  • औद्योगिक कन्ट्रोल पेनल में पावर सर्किट उपकरण जैसे-अतिधारा युक्ति या मोटर कन्ट्रोलर, कन्ट्रोल सर्किट उपकरण जैसे पुश बटन, लाइटें तथा कन्ट्रोल रिले आदि उपयोग किये जाते हैं।
  • कन्ट्रोल पेनल की डिजाइन वैद्युत विशिष्टताएं जैसे - वोल्टेज, फेजों की संख्य, आवृत्ति, फुल लोड धारा रेटिंग, लघु परिपथ धारा रेटिंग आदि को ध्यान में रखकर करनी चाहिए।
  • किसी भवन में वैद्युत इन्सटॉलेशन  के कार्य की सफलता, वैद्युत वायरिंग के सही आयोजन पर निर्भर करती है। भवनों के लिए वायरिंग का आयोजन करते समय भविष्य में किए जाने वाले विस्तार, वायरिंग कार्य में सुगमता, वायरिंग के उपयोग के समय सुरक्षा तथा उचित प्रदीपन को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त भारतीय विद्युत नियमों का भी पालन किया जाना चाहिए। आवासीय भवन की वायरिंग के लिए उस भवन का मानचित्र एवं भवन मालिक की आवश्यकताओं के अनुरूप ही वैद्युत वायरिंग की योजना तैयार की जाती है। 

प्रदीपन - 4

  • लैम्बर्ट्स कोज्या नियम (Lamberts cosine Law) - किसी प्रकाश स्त्रोत के द्वारा किसी प्रकाशित तल पर पहुंचने वाली प्रदीप्ति, स्त्रोत से आने वाली प्रकाश किरण तथा अभिलम्ब (normal) के बीच बने कोण की कोज्या (cosine) के अनुक्रमानुपाती होती है।
  • विभिन्न प्रकार के लैम्पों की विशेषताएं एवं अनुप्रयोग –
  1. उद्दीप्त (incandescent) लैम्प-परास -8-18, सामन्य परास-14,   रंग-श्रेष्ठ (excellent),अनुप्रयोग-घरों में, रेस्टोरेन्ट में, सामान्य लाइटिंग में, इमरजेंसी लाइटिंग,जीवन काल -1000 hrs
      2.फ्लोरेसेन्ट लैम्प- परास -46-60, सामन्य परास -50 ,रंग-उत्तम कोटिंग सहित (good w.r.t. coating), अनुप्रयोग-ऑफिस             , दुकान, हॉस्पिटल व  घरों में, जीवन काल -5000 hrs.
      3.कॉस्पेक्ट फ्लोरेसेन्ट लैम्प (CFL), परास -40-70, सामन्य परास-60,रंग -बहुत उत्तम (verygood )                
      4.हाई प्रेशर मरक्यूरी वेपर लैम्प-    परास -44-57, सामन्य परास-50, रंग-सामान्य (fair)                    
      5.हाई प्रेशर सोडियम वेपर लैम्प-परास -67-121; सामन्य परास-90,   रंग-सामान्य (fair)         
      6.लो प्रेशर सोडियम वेपर लैम्प-परास 101-175, सामन्य परास-150,रंग0-सामान्य से कम (poor)          

प्रदीपन - 3

  • अंतरिक्ष में क्षेत्रफल द्वारा एक बिन्दु पर बनाए गए कोण को घन कोण (या ठोस कोण) कहते हैं।
  • अवशोषित प्रकाश तथा आपतित प्रकाश के अनुपात को अवशोषण गुणक कहा जाता है।
·         अवशोषण गुणक = अवशोषित प्रकाश/आपतित प्रकाश
  • कार्य स्थानों पर प्राप्त ल्यूमेन और लैम्प द्वारा उत्पन्न ल्यूमेन का अनुपात ही उपयोगिता गुणक कहलाता है।
·         उपयोगिता गुणक = स्थान तक पहुंचने वाला ल्यूमेन/स्त्रोत से उत्पन्न कुल ल्यूमेन
  • स्त्रोत द्वारा उत्सर्जित कुल ल्यूमेन फ्लक्स तथा स्त्रोत की निवेशी (input) विद्युत शक्ति के अनुपात को ही लैम्प दक्षता कहा जाता है। इसकी इकाई lumen/Watt  होती है।
  • प्रदीपन के दो नियम प्रतिपादित हुए हैं, जो कि निम्न है -
  1. प्रतिलोम वर्ग नियम (Inverse square law)     
  2. लैम्बर्टस कौज्या नियम  (Lamberts cosine Law)
  • प्रतिलोम वर्ग नियम (Inverse Square Law) – किसी  प्रकाश स्त्रोत द्वारा किसी प्रकाशित तल पर पहुंचने वाली प्रदीप्ति, उस तल से प्रकाश स्त्रोत की दूरी के वर्ग के व्युतक्रमानुपाती तथा प्रदीप्ति तीव्रता के  अनुक्रमानुपाती होती है ।

प्रदीपन - 2


  • कैण्डला ज्योति तीव्रता की इकाई है जो SI पद्धति में है। इसे cd से व्यक्त करते है और इसके चारों ओर फ्लक्स 4p x 1 = 4p ल्यूमेन प्राप्त होता है।
  • यदि किसी खोखले गोले का व्यास एक मीटर हो और अर्द्धव्यास के गोले के अंदर प्रदीप्त है और केन्द्र पर एक कैण्डल शक्ति का प्रकाश डाल दिया जाए तो प्रदीप्त एक मीटर कैण्डला होगी। यह प्रदीप्त की इकाई है और यह ल्यूमेन प्रतिवर्ग मीटर के तुल्य है।
  • वह घटना जो किसी सतह पर प्रकाश पड़ने पर उत्पन्न होती है, प्रदीपन कहलाती है। इसे इकाई क्षेत्रफल पृष्ठ पर पड़ने वाले ल्यूमेन ;(Lumens) की संख्या से परिभाषित किया जा सकता है जिसे E से प्रदर्शित करते है। इसे ल्यूमेन प्रति मीटर2 या लक्स ;(lux) या मीटर कैण्डला में मापा जाता है।
  • यदि किसी एक मीटर व्यास वाले गोले के केन्द्र पर एक कैण्डल शक्ति का प्रकाश डाला जाए तो उसके अंदर उत्पन्न प्रदीपन को मीटर कैण्डल शक्ति कहते हैं।
  • दो सरल रेखाओं को एक ही तल में एक ही बिन्दु पर मिलाने पर उनके मध्य बने कोण (angle ) को समतल कोण कहा जाता है। इसकी इकाई रेडियन (radin) होती है। 

प्रदीपन - 1



  • प्रदीपन एक प्रकाश विकिरण ऊर्जा का ही रूप है। प्रदीपन लाइटिंग स्त्रोत द्वारा किए जाने वाले प्रकाश की मात्रा है।
  • प्रकाश स्त्रोत द्वारा किसी दी हुई निश्चित दिशा में प्रति इकाई घन कोण उत्सर्जित ल्यूमेन की संख्या को उसकी कैण्डल शक्ति कहते है।
  • प्रकाश स्त्रोत द्वारा किसी दी हुई दिशा में प्रति इकाई धन कोण के विकिरित ज्योतीय फ्लक्स को उसकी ज्योतीय तीव्रता कहते हैं।
  • किसी ज्योतीय पिण्ड से प्रति सैकण्ड प्रकाश तरंगों के रूप में विकिरित (raditated) ऊर्जा को ज्योतीय फ्लक्स कहते है। इसे F या ф से व्यक्त किया जाता है। इसकी इकाई lumen है।
  • ल्यूमेन, ज्योतीय फ्लक्स की SI इकाई है और इसे ज्योतीय फ्लक्स के तुल्य माना गया है जो कि एक कैण्डल शक्ति के स्त्रोत द्वारा इकाई घन कोण (Solid angle ) में सभी दिशाओं में प्रदान किया जाता है। 

डी.सी. व ए.सी. मशीन आर्मेचर वाइन्डिंग - 4

  • ए.सी. आर्मेचर वाइन्डिंग से संबंधित परिभाषाएं निम्न हैं -
  1. पोल पिच - दो संलग्न एवं असमान पोलों की बीच की दूरी पोल पिच कहलाती है। पोल पिच = स्टेटर स्लॉटो की संख्या/पोलों की संख्या
  2. क्वॉइल पिच - एक क्वॉइल की दो सक्रिय साइड जो असमान धु्रवों के अन्तर्गत हो, के बीच की दूरी क्वॉइल पिच या वाइन्डिंग पिच या क्वॉइल स्पान कहलाती है।
  3. पिच फैक्टर - क्वॉइल पिच या वाइन्डिंग पिच तथा पोल पिच का अनुपात पिच फैक्टर कहलाता है। पिच फैक्टर = वाइनिडंग पिच/पोल पिच
  4. क्वॉइल गु्रप - यदि मशीन वाइन्डिंग में एक से अधिक क्वॉइलों को श्रेणी क्रम में संयोजित कर समूह बना दिया जाता है तो वह क्वॉइल गु्रप कहलाता है।
  • एकल परत वाइन्डिंग में स्टेटर या आर्मेचर में क्वॉइल की कुल संख्या, स्लॉटो की कुल संख्या की आधी होती है।
  • द्वि-परत वाइन्डिंग में स्टेटर या आर्मेचर में क्वॉइल की कुल संख्या, स्लॉटो की कुल संख्या के बराबर होती है।
  • पूर्ण पिच वाइन्डिंग में क्वॉइल पिच तथा पोल पिच बराबर होती है।
  • लघु पिच वाइन्डिंग में क्वॉइल पिच, पोल पिच से कम होती है।
  • पूर्णांकीय वाइन्डिंग में प्रति पोल, प्रति फेज , स्लॉटो की संख्या एक पूर्ण संख्या होती है।
  • भिन्नात्मक वाइन्डिंग में प्रति पोल , स्लॉट तथा प्रति पोल प्रति फेज , स्लॉट की संख्या भिन्नात्मक होती है। 

डी.सी. व ए.सी. मशीन आर्मेचर वाइन्डिंग - 3


  • डी.सी. आर्मेचर वाइन्डिंग दो प्रकार की होती है -
  1. लैप वाइन्डिंग                   
  2. वेव वाइन्डिंग 
  • क्वॉइल के सिरों को कम्यूटेटर सेग्मेन्ट पर जोड़ने की प्रक्रिया को क्वॉइल कनेक्शन कहा जाता है। क्वॉइल कनेक्शन मुख्यतः प्रोग्रेसिव तथा रिट्रोग्रेसिव प्रकार के होते हैं।
  • ग्राउलर एक विद्युतीय युक्ति है जिसका उपयोग मोटर का इन्सुलेशन प्रतिरोध चेक करने के लिए किया जाता है। यह दो प्रकार का होता है -
  1. इन्टर्नल ग्राउलर         
  2. एक्सटर्नल ग्राउलर
  • इन्टर्नल ग्राउलर का उपयाग वृहद् डी.सी. मोटर के आर्मेचर तथा ए.सी. मोटर के स्टेटर में किया जाता है तथा एक्सटर्नल ग्राउलर का उपयोग लघु डी.सी. मोटर के आर्मेचर के लिए किया जाता है।
  • ग्राउलर का उपयोग मशीन के अन्दर शार्ट सर्किट, ओपन सर्किट, अर्थ टैस्ट, बैंलेस टेस्ट प्रकार के दोषों (fault) को चेक करने के लिए किया जाता है।
  • वाइन्डिंग में चालकीय तथा कुचालकीय पदार्थ उपयोग किये जाते हैं। 

डी.सी. व ए.सी. मशीन आर्मेचर वाइन्डिंग - 2


  • डी.सी. मशीन की आर्मेचर वाइन्डिंग में उत्पनन विद्युत वाहक बल प्रत्यावर्ती प्रवृत्ति का होता है।
  • डी.सी. आर्मेचर पर वाइन्डिंग करने के लिए निम्न दो पद्धतियों का उपयोग किया जाता है -
  1.  रिंग आर्मेचर पद्धति   
  2.  ड्रम आर्मेचर पद्धति 
  • डी.सी. आर्मेचर वाइन्डिंग से सम्बन्धित परिभाषाएं निम्न है -
  1. पोल पिच - इसे आर्मेचर चालकों की संख्या प्रति पोल या आर्मेचर  स्लॉटो की संख्या प्रति पोल से परिभाषित किया जाता है।
  2.  क्वॉइल पिच या क्वॉइल स्थान - एक क्वॉइल की दो सक्रिय साइड जो असमान ध्रुवो  के अन्तर्गत हो, के बीच की दूरी क्वॉइल पिच या वाइन्डिंग पिच या क्वॉइल स्पान कहलाती है।
  3.  कम्यूटेटर पिच - यह कम्यूटेटर सेग्मेंट पर एक क्वॉइल के दो सिरों को जोड़ने के बीच की दूरी है।
  4. बैक पिच - यह एक दूरी हे, जिसे आर्मेचर चालकों की terms में ज्ञात किया जाता है। कम्यूटेटर के विपरीत दिशा में किसी क्वॉइल की दोनों साइडो के बीच की दूरी को बैक पिच कहते हैं।
  5. फ्रन्ट पिच - आर्मेचर से कम्यूटेटर के ओर की एक क्वॉइल की अन्तिम भुजा तथा उससे अगली क्वॉइल की पहली भुजा के बीच की दूरी को फ्रन्ट पिच कहते हैं।
  6. वाइन्डिंग पिच - दो संलग्न क्वॉइलों की प्रथम एक्टिव साइडों के बीच की दूरी, वाइन्डिंग पिच कहलाती है। इसे Y द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यह दूरी भी स्लॉटो अथवा चालकों की संख्या के रूप में व्यक्त की जाती है।
     लैप वाइन्डिंग के लिए, Y = Yp –Y f
     वेव वाइन्डिंग के लिए, Y = Yp +Y f

डी.सी. व ए.सी. मशीन आर्मेचर वाइन्डिंग - 1


  • आर्मेचर वाइन्डिंग, इलेक्ट्रिकल मशीन का वह मुख्य भाग है जिसमें विद्युत वाहक बल (e.m.f.) उत्पन्न होता है। ।A.C मशीनों में आर्मेचर वाइन्डिंग स्टेटर पर बने आधे ढके या खुले स्लॉटो  पर लपेटी जाती है जबकी डी.सी. मशीन में आर्मेचर वाइन्डिंग बंद स्लॉटो पर लपेटी जाती है, अतः स्टेटर भाग में क्वॉइलो के समूहों को निश्चित ढंग से रखा जाना, आर्मेचर वाइन्डिंग कहलाता है। इलेक्ट्रोमेग्नेट तैयार करने, पंखो, डी.सी. मोटर, ऑल्टरनेटर , त्रिकलीय मोटर, सिंगल फेज मौटर, रिले व अन्य विद्युत उपकरणों में आर्मेचर वाइन्डिंग के व्यावहारिक प्रयोग का विशेष महत्व है।
  • आर्मेचर वाइन्डिंग मुख्यतः दो प्रकार की होती है -
  1.  बन्द क्वॉइल  वाइन्डिंग (Closed Coil Winding) - यह वाइन्डिंग डी.सी. मशीनों में की जाती है और इसे डी.सी. आर्मेचर वाइन्डिंग भी कहते है। इसमें सभी क्वॉइलो के सिरों को एक-दूसरे के श्रेणी-क्रम में संयोजित करते हुए अन्त में दो सिरे प्राप्त होते हैं जो स्त्रोत में संयोजित कर दिए जाते हैं।
  • खुली क्वॉइल वाइन्डिंग (Open Coil Winding) - यह वाइन्डिंग ए.सी. मशीनों में की जाती है और इसमें सभी क्वॉइलो के सिरे स्वतंत्र रखे जाते है और उन्हें वान्छित क्रम में संयोजित किया जा सकता है। 

ट्रांसफॉर्मर वाइन्डिंग - 3


  • वृत्ताकार चालक के साथ सिलेण्ड्रीकल वाइन्डिंग, 33kV तथा (5000-8000) kVA। तक उच्च वोल्टेज वाइन्डिंग में प्रयुक्त होती है।
  • क्रॉस -ओवर वाइन्डिंग निम्न वोल्टेज तथा निम्न धारा के लिए प्रयुक्त होती है व छोटे ट्रांसफार्मर में यह उच्च वोल्टेज की तरफ प्रयुक्त की जाती है।
  • सतत् डिस्क क्वाॅइल प्रकार की वाइन्डिंग 3.3-220kV तथा (200-10,000)kVA। तक आधुनिक ट्रांसफार्मर में प्रयुक्त की जाती है।
  • डिस्क प्रकार की वाइन्डिंग को मुख्यता 33kV या अधिक रेंज के उच्च वोल्टेज ट्रांसफार्मर में उपयोग किया जाता है।
  • हेलिकल वाइन्डिंग को अधिक धारा तथा कम टर्न वाले ट्रांसफार्मर में उपयोग किया जाता है। सैण्डविच प्रकार की वाइन्डिंग मुख्यता शैल प्रकार के ट्रांसफॉर्मर  में उपयोग की जाती है।
  • ट्रांसफॉर्मर वाइन्डिंगों के प्रकारों का  चयन -
  1. सिलेण्ड्रीकल (वृताकार चालक)     5000- 10,000kV। 33kV तक ,8amp तक    30 mm2 तक     1 से 2
  2. सिलेण्ड्रीकल (आयताकार चालक के साथ)  5000- 8000kVA। 6kVA तक 10-600amp    5.200 mm2 1 से 4
  3. क्रॉस-ओवर 1000kVA। तक 33kV तक 40amp तक            15mm2   1
  4. हेलिकल 160 से 1000kVA। तक   15kV तक (कुछ समय 33kV तक 300amp. तथा अधिक  75.100 mm2  तथा इससे अधिक          4 से 16
  5. सतत् डिस्क      200-10,00kVA। तक 3.3-220kV तक 12amp  तथा अधिक  4 से 200mm2  तथा इससे अधिक    1 से 4

ट्रांसफॉर्मर वाइन्डिंग - 2


  • ट्रांसफार्मर में विभिन्न प्रकार की वाइन्डिंग तकनीक प्रयोग की जाती है -
  1. सिलेण्ड्रीकल वाइन्डिंग
  2. क्रॉस -ओवर वाइन्डिंग
  3. सतत् डिस्क क्वाॅइल प्रकार की वाइन्डिंग
  4. डिस्क प्रकार की वाइन्डिंग
  5. हेलिकल वाइन्डिंग
  6. सैण्डविच वाइन्डिंग
  • आयताकार चालक के साथ सिलेण्ड्रीकल वाइन्डिंग मुख्यता निम्न वोल्टेज वाइन्डिंग में प्रयुक्त होती है। इस प्रकार की वाइन्डिंग 6kV तथा (5000-8000) kVA। निर्गत तक प्रयुक्त की जाती है।
  • वृत्ताकार चालक के साथ सिलेण्ड्रीकल वाइन्डिंग, 33kV तथा (5000-8000) kVA। तक उच्च वोल्टेज वाइन्डिंग में प्रयुक्त होती है।
  • क्रॉस -ओवर वाइन्डिंग निम्न वोल्टेज तथा निम्न धारा के लिए प्रयुक्त होती है व छोटे ट्रांसफार्मर में यह उच्च वोल्टेज की तरफ प्रयुक्त की जाती है। 

ट्रांसफॉर्मर वाइन्डिंग - 1


  • ट्रांसफार्मर एक स्थैतिक विद्युत चुम्बकीय युक्ति होती है जिसमें दो या दो से अधिक वाइन्डिंग एक संयुक्त चुम्बकीय क्षेत्र रखती है। वह वाइन्डिंग जो तुलनात्मक रूप से कम वोल्टेज रेटिंग रखती है, निम्न वोल्टेज वाइन्डिंग (Low voltage winding) कहलाती है तथा वह वाइन्डिंग जो तुलनात्मक रूप से ज्यादा वोल्टेज रेटिंग रखती है, उच्च वोल्टेज वाइन्डिंग (High voltage winding) कहलाती है। ये दोनों वाइन्डिंग ट्रांसफार्मर के प्रत्येक लिम्ब (Limb) पर वाउण्ड रहती है, जो कि लीकेज फ्लक्स को कम करती है।
  • निम्न वोल्टेज वाइन्डिंग की स्थिति, कोर के नजदीक अंदर की तरफ तथा उच्च वोल्टेज वाइन्डिंग की स्थिति बाहर की तरफ होती है। इस व्यवस्था का उपयोग निम्न वोल्टेज वाइन्डिंग तथा कोर के मध्य विभवान्तर कम होने के कारण किया जाता है। इस स्थिति में फ़ॉल्ट  उत्पन्न होने की संभावना कम रहती है।
  • कोर के नजदीक निम्न वोल्टेज वाइन्डिंग की स्थिति में कोर तथा वाइन्डिंग के मध्य कम मोटाई का इन्सुलेशन प्रदान किया जाता है। जब कोर के नजदीक उच्च वोल्टेज वाइन्डिंग को स्थापित किया जाता है तब कोर तथा वाइन्डिंग के मध्य अधिक मोटाई का इन्सुलेशन प्रदान किया जाता है। 

कनवर्टर - 3

  • मोटर-जनरेटर सेट में एक ए.सी. मोटर, डी.सी. जनरेटर से यांत्रिक रूप से जुड़ी होती है। यह मोटर-जनरेटर सेट एककलीय या त्रिकलीय हो सकता है। ए.सी. मोटर, तुल्यकालिक मोटर या प्रेरण मोटर हो सकती है। बड़ी यूनिटों में ए.सी. मोटर को तुल्यकालिक तथा डी.सी. जनरेटर का कम्पाउड प्रकार का लेते हैं।
  • मोटर-जनरेटर सेट में मोटर को ए.सी. सप्लाई दी जाती है। इसके कारण मोटर का शाफ्ट, जनरेटर के रोटर को घुमाता है।
  • मोटर-जनरेटर सेट में हन्टिंग से बचाव के लिए तुल्यकालिक मोटर के पोल फेस पर स्लिप रिंग लगाते हैं।
  • सॉलिड -स्टेट कन्ट्रोलर को मोटर स्टार्ट करने के लिए प्रयोग किया जाताह है ।
  • सॉलिड स्टेट कन्ट्रोलर को मुख्यता ए.सी. मोटरों की सरल स्टार्टिंग या स्टेपलेस रिड्यूस्ड वोल्टेज स्टार्टिंग के लिए उपयोग किया जाता है।
  • सॉलिड स्टेट कन्ट्रोलर के तीन मोड होते हैं -
    (1) सॉफ्ट  स्टार्ट
   (2) धारा नियंत्रण   
   (3) फुल वोल्टेज
  • सॉलिड स्टेट कन्ट्रोलर, मोटर पर आरोपित वोल्टेज को भी नियंत्रित करता है।
  • मोटर-जनरेटर सेट के लिए सॉलिड स्टेट इनवर्टर का प्रयोग किया जाता है।
  • परिवर्ती स्पीड ड्राइव, सिस्टम में स्पीड को एडजस्ट करके सिस्टम को चलाया जाता है जिससे पावर सप्लाई आवृत्ति परिवर्तित होती है।

कनवर्टर - 2


  • इनवर्टर मुख्यता दो प्रकार के होते है -
(1) रोटरी इनवर्टर       
(2) इलेक्ट्रोनिक्स इनवर्टर
  • रोटर इनवर्टर में ए.सी. साइड, तुल्यकालिक मोटर की तरह कार्य करती हैं तथा डी.सी. साइड, एक डी.सी. शंट या कम्पाउण्ड मोटर की तरह कार्य करती है।
  • इलेक्ट्रोनिक्स इनवर्टर को स्थैतिज इनर्वटर भी कहा जाता है।
  • इलेक्ट्रोनिक्स इनवर्टर दो प्रकार के होते हैं -
(1) बाई - पोलर ट्रांजिस्टर टाइप इनवर्टर
(2) डिजीटल MOSFET टेक्नोलोजी टाइप इनवर्टर
  •   मोटर-जनरेटर सेट में एक ए.सी. मोटर, डी.सी. जनरेटर से यांत्रिक रूप से जुड़ी होती है। यह मोटर-जनरेटर सेट एककलीय या त्रिकलीय हो सकता है। ए.सी. मोटर, तुल्यकालिक मोटर या प्रेरण मोटर हो सकती है। बड़ी यूनिटों में ए.सी. मोटर को तुल्यकालिक तथा डी.सी. जनरेटर का कम्पाउड प्रकार का लेते हैं। 

कनवर्टर - 1


  • पावर इलेक्ट्रोनिक्स  सिस्टम में एक या एक से अधिक पावर इलेक्ट्रोनिक्स कनवर्टर होते है। ये पावर इलेक्ट्रोनिक्स कनवर्टर कई पावर अर्द्धचालक युक्तियों से बने होते है तथा इन्हें इन्टीग्रेटेड (Integrated) परिपथ द्वारा कन्ट्रोल किया जाता है। कनवर्टर परिपथ में उपस्थित एक प्रकार की पावर को दूसरे प्रकार की पावर में रूपान्तरित करता है।
  • डायोड रेक्टिफायर परिपथ के द्वारा ए.सी. इनपुट वोल्टेज को डी.सी. वोल्टेज में रूपान्तरित किया जाता है।
  • ए.सी.-डी.सी. कनवर्टर द्वारा नियम ए.सी. वोल्टेज को परिवर्ती डी.सी. वोल्टेज में रूपान्तरित किया जाता है। इसे फेज नियंत्रित रेक्टिफायर भी कहा जाता है।
  • डी.सी. चोपर द्वारा फिक्स डी.सी. इनपुट वोल्टेज को नियंत्रित कर उसे डी.सी. आउटपुट वोल्टेज में रूपान्तरित किया जाता है।
  • इनवर्टर में फिक्स डी.सी. वोल्टेज को परिवर्ती ए.सी. वोल्टेज में रूपान्तरित किया जाता है।
  • ए.सी. वोल्टेज कन्ट्रोलर में समान आवृत्ति पर, फिक्स ए.सी. वोल्टेज को परिवर्ती ए.सी. वोल्टेज में रूपान्तरित किया जाता है।
  • साइक्लो कनवर्टर में परिवर्ती आवृत्ति पर इनपुट पावर को आउटपुट पावर में रूपान्तरित किया जाता है। 

तुल्यकालिक मोटर - 2


  • यदि तुल्यकालिक मोटर के प्रथम चालक को मोटर से विच्छेदित कर दिया जाए तो तुल्यकालिक मशीन, मोटर के रूप में कार्य करने लगती है।
  • तुल्यकालिक मोटर स्वचालित नहीं होती है। इसे स्वचालित बनाने के लिए रोटर को इतनी गति पर घुमाया जाता है कि जितने समय में रोटर पोल अपनी ध्रुवता  (Polarity) बदलते हैं, उतने समय में रोटर बवश्य ही एक पोल पिच की दूरी तय कर लें।
  • तुल्यकालिक मोटर सदैव तुल्यकालिक गति से ही चलती है तथा चलते समय एक समान गति बनाए रखती है। सप्लाई की आवृत्ति को बदलकर ही तुल्यकालिक मोटर की गति को बदला जा सकता है। क्योंकि -
 Ns=120f /p
Ns= तुल्यकालिक गति,
f = आवृत्ति,
p = ध्रुवो  की संख्या
  • तुल्यकालिक मोटर के प्रारम्भन हेतु निम्न विधियां प्रयोग में ली जाती है -
  1. पोनी (छोटी) मोटरों का उपयोग करके।
  2. अवमन्दक या डेम्पर वाइन्डिंग का प्रयोग करके।
  3. दिष्ट धारा स्त्रोत प्रयोग करकें।
  4. स्लिपरिंग प्रेरण मोटर के तरह प्रयोग करके।
  • तुल्यकालिक मोटरें उन फैक्ट्रिों में शक्ति गुणक बढ़ाने के लिए प्रयोग की जाती है, जहां पर कई प्रेरण मोटरें लगी होती है।
  • तुल्यकालिक मोटर जनरेटर सैट को स्थिर गति पर चलाने के लिए, आवृत्ति परिवर्तक प्राइमूवर चलाने के लिए, कम्प्रेशर, पम्प, लाइन शाफ्ट को चलाने के लिए प्रयोग की जाती है।