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कनवर्टर - 3

  • मोटर-जनरेटर सेट में एक ए.सी. मोटर, डी.सी. जनरेटर से यांत्रिक रूप से जुड़ी होती है। यह मोटर-जनरेटर सेट एककलीय या त्रिकलीय हो सकता है। ए.सी. मोटर, तुल्यकालिक मोटर या प्रेरण मोटर हो सकती है। बड़ी यूनिटों में ए.सी. मोटर को तुल्यकालिक तथा डी.सी. जनरेटर का कम्पाउड प्रकार का लेते हैं।
  • मोटर-जनरेटर सेट में मोटर को ए.सी. सप्लाई दी जाती है। इसके कारण मोटर का शाफ्ट, जनरेटर के रोटर को घुमाता है।
  • मोटर-जनरेटर सेट में हन्टिंग से बचाव के लिए तुल्यकालिक मोटर के पोल फेस पर स्लिप रिंग लगाते हैं।
  • सॉलिड -स्टेट कन्ट्रोलर को मोटर स्टार्ट करने के लिए प्रयोग किया जाताह है ।
  • सॉलिड स्टेट कन्ट्रोलर को मुख्यता ए.सी. मोटरों की सरल स्टार्टिंग या स्टेपलेस रिड्यूस्ड वोल्टेज स्टार्टिंग के लिए उपयोग किया जाता है।
  • सॉलिड स्टेट कन्ट्रोलर के तीन मोड होते हैं -
    (1) सॉफ्ट  स्टार्ट
   (2) धारा नियंत्रण   
   (3) फुल वोल्टेज
  • सॉलिड स्टेट कन्ट्रोलर, मोटर पर आरोपित वोल्टेज को भी नियंत्रित करता है।
  • मोटर-जनरेटर सेट के लिए सॉलिड स्टेट इनवर्टर का प्रयोग किया जाता है।
  • परिवर्ती स्पीड ड्राइव, सिस्टम में स्पीड को एडजस्ट करके सिस्टम को चलाया जाता है जिससे पावर सप्लाई आवृत्ति परिवर्तित होती है।

कनवर्टर - 2


  • इनवर्टर मुख्यता दो प्रकार के होते है -
(1) रोटरी इनवर्टर       
(2) इलेक्ट्रोनिक्स इनवर्टर
  • रोटर इनवर्टर में ए.सी. साइड, तुल्यकालिक मोटर की तरह कार्य करती हैं तथा डी.सी. साइड, एक डी.सी. शंट या कम्पाउण्ड मोटर की तरह कार्य करती है।
  • इलेक्ट्रोनिक्स इनवर्टर को स्थैतिज इनर्वटर भी कहा जाता है।
  • इलेक्ट्रोनिक्स इनवर्टर दो प्रकार के होते हैं -
(1) बाई - पोलर ट्रांजिस्टर टाइप इनवर्टर
(2) डिजीटल MOSFET टेक्नोलोजी टाइप इनवर्टर
  •   मोटर-जनरेटर सेट में एक ए.सी. मोटर, डी.सी. जनरेटर से यांत्रिक रूप से जुड़ी होती है। यह मोटर-जनरेटर सेट एककलीय या त्रिकलीय हो सकता है। ए.सी. मोटर, तुल्यकालिक मोटर या प्रेरण मोटर हो सकती है। बड़ी यूनिटों में ए.सी. मोटर को तुल्यकालिक तथा डी.सी. जनरेटर का कम्पाउड प्रकार का लेते हैं। 

कनवर्टर - 1


  • पावर इलेक्ट्रोनिक्स  सिस्टम में एक या एक से अधिक पावर इलेक्ट्रोनिक्स कनवर्टर होते है। ये पावर इलेक्ट्रोनिक्स कनवर्टर कई पावर अर्द्धचालक युक्तियों से बने होते है तथा इन्हें इन्टीग्रेटेड (Integrated) परिपथ द्वारा कन्ट्रोल किया जाता है। कनवर्टर परिपथ में उपस्थित एक प्रकार की पावर को दूसरे प्रकार की पावर में रूपान्तरित करता है।
  • डायोड रेक्टिफायर परिपथ के द्वारा ए.सी. इनपुट वोल्टेज को डी.सी. वोल्टेज में रूपान्तरित किया जाता है।
  • ए.सी.-डी.सी. कनवर्टर द्वारा नियम ए.सी. वोल्टेज को परिवर्ती डी.सी. वोल्टेज में रूपान्तरित किया जाता है। इसे फेज नियंत्रित रेक्टिफायर भी कहा जाता है।
  • डी.सी. चोपर द्वारा फिक्स डी.सी. इनपुट वोल्टेज को नियंत्रित कर उसे डी.सी. आउटपुट वोल्टेज में रूपान्तरित किया जाता है।
  • इनवर्टर में फिक्स डी.सी. वोल्टेज को परिवर्ती ए.सी. वोल्टेज में रूपान्तरित किया जाता है।
  • ए.सी. वोल्टेज कन्ट्रोलर में समान आवृत्ति पर, फिक्स ए.सी. वोल्टेज को परिवर्ती ए.सी. वोल्टेज में रूपान्तरित किया जाता है।
  • साइक्लो कनवर्टर में परिवर्ती आवृत्ति पर इनपुट पावर को आउटपुट पावर में रूपान्तरित किया जाता है। 

प्रतिरोध - 3

डी.सी. व ए.सी. परिपथों में वोल्टेज मापने के लिए यह यन्त्र प्रयुक्त होता है। वे मूविंग क्वॉयल व मूविंग आयरन दो प्रकार के होते है। ।AC  व DC दोनों एम.आई. टाइप यंत्र से मापते हैं।
वाट मीटर से परिपथ की शक्ति मापते हैं इसमें चार टर्मिनल M.I, C व V  होते हैं।
ऊर्जा मीटर से ऊर्जा मापते हैं। ये सिंगल फेज व तीन फेज के आते है। घरों में सिंगल फेज ऊर्जा मीटर प्रयोग में आते हैं।
भारत की ए.सी. सप्लाई फ्रिक्वेन्सी 50 चक्र प्रति सैकण्ड है। फ्रिक्वेन्सी को हर्ट्ज में मापते है। इसे मीटर  से चिन्हित करते है। इस मीटर को सप्लाई के समानान्तर में लगाया जाता है।
एम्पियर मीट की रेंज बढ़ाने हेतु क्वॉयल के समानान्तर में एक कम मात्रा का प्रतिरोध जोड़ा जाता है। इस प्रतिरोध को शन्ट नाम से जाना जाता है।
वोल्टमीटर की रंज इसके क्वॉयल श्रेणी में आवश्यक मात्रा का प्रतिरोध लगाकर बढ़ायी जा सकती है। 

प्रतिरोध - 2

प्रतिरोधों का संयोजन तीन प्रकार से होता है -
1. श्रेणी संयोजन
2. समानान्तर संयोजन
3. श्रेणी-समानान्तर संयोजन
श्रेणी परिपथ में प्रत्येक शाखा के विभिन्न प्रतिरोधों का योग परिपथ का कुल प्रतिरोध कहलाता है।
समानान्तर परिपथ में कुल चालकता उस परिपथ की चालकता के विपरीत अनुपात में होती है।
किसी पूर्ण विद्युत परिपथ में गुजरने वाली धारा वोल्टता के समानुपाती तथा परिपथ के प्रतिरोध के विलोमानुपाती होती है।
एम्पियर मीटर धारा मापने का यंत्र होता है। वे मूविंग क्वॉयल  मूविंग आयरन दो प्रकार के होते हैं। 

प्रतिरोध - 1

किसी चालक के धारा प्रवाह में उत्पन्न विरोधी बल को प्रतिरोध कहते है। जिसे R द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
प्रतिरोध का गुण दर्शाने वाले अवयव को प्रतिरोधक कहा जाता है।
प्रतिरोधकों की किस्में Types of Resistors)
प्रतिरोधक मुख्य रूप से दो प्रकार के होते है -
(1) कार्बन प्रतिरोधक
(2) वायर वाउण्ड प्रतिरोधक
कार्बन प्रतिरोधक कार्बन अथवा ग्रेफाइट के महीन चूर्ण को किसी उपयुक्त अचालक व बन्धक पदार्थ के साथ मिलकर तैयार किए जाते हैं।
वायर वाउण्ड प्रतिरोधक यूरेका अथव मैंगनिन नाम मिश्र धातु के महीन व नंगे तार को चीनी मिट्टी, सैरामिक या बैकेलाइट से बने पाइप/शीट पर लपेटकर तैयार किए जाते हैं।
प्रतिरोध के नियम के अनुसार -
1. चालक के प्रतिरोध की वृद्धि उसके लम्बाई के समानुपाती होती है।
2. चालक का प्रतिरोध उसके अनुपस्थ काट क्षेत्रफल के विलोमानुपाती होता है।
3. चालक का प्रतिरोध पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है।
4. चालक का प्रतिरोध उसके तापमान पर भी निर्भर करता है।
किसी पदार्थ के इकाई घन के आमने-सामने वाले तलों के मध्य के प्रतिरोध को उस पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध कहते हैं।